ALL political social sports other crime current religious administrative
प्राचीन पवित्र छड़ी यात्रा नौउटी गांव में श्रीयंत्र की पूजा अर्चना के बाद कुमायूॅ भ्रमण पर
September 30, 2020 • Sharwan kumar jha • religious

हरिद्वार।  उत्तराखण्ड के समस्त पौराणिक तीर्थो व चारधाम की यात्रा को हरिद्वार से प्रारम्भ की गयी श्रीपंच दशनाम जूना आनंद अखाड़ा की प्राचीन पवित्र छड़ी यात्रा बुधवार को छड़ी प्रमुख महंत श्रीमहंत प्रेम गिरि महाराज के नेतृत्व में कर्णप्रयाग से नौउटी गांव श्रीयंत्र पूजन के लिए पहुची। नौउटी गाॅव पहुचने पर श्रीयंत्र मन्दिर के पुजारी मदन प्रसाद मैठाणी, ग्राम प्रधान सुभाष नौटियाल,राजेश सेमल्टी,राकेश नौटियाल,अतुल बाबा,महाकाल गिरि व ग्रामीणों ने पुष्पवर्षा कर पवित्र छड़ी तथा साधुओं के जत्थे का स्वागत किया तथा छड़ी की पूजा अर्चना की।               बताते चले कि नौटी गाॅव से ही उत्तराखंड के कुम्भ के नाम से विख्यात नंदाराजजात यात्रा प्रारम्भ होती है जो कि प्रत्येक 12वर्षो में आयोजित की जाती है। नंदा देवी गढ़वाल व कुमायुॅ की इष्टदेवी है। नंदाष्टमी के दिन नंदा देवी अपने ससुराल हिमालय मंे भगवान शिव के घर ले जाने के लिए राजजात यात्रा आयोजित की जाती है। नंदादेवी को पार्वती का ही रूप माना जाता है। नौटी गांव में स्थित पौराणिक काल के श्रीयंत्र की पूजा अर्चना के पश्चात ही शुभमुहूर्त में राजजात यात्रा प्रारम्भ की जाती है। नौउटी गाॅव में पूजा अर्चना से पूर्व पौराणिक नगर कर्णप्रयाग में मंगलवार की शाम पवित्र छड़ी के पहुचने पर अलकनंदा तथा पिण्डर नदी के संगम पर स्थित संगम महादेव मन्दिर में मंडल श्रीमहंत शिवानंद गिरि,महंत नागेश्वर गिरि महंत ऐश्वर्यनाथ के नेतृत्व में नागरिकों ने ढोल,बाजे,नगाड़ो की तुमूल ध्वनि पूष्प वर्षा कर भव्य स्वागत किया। पवित्र छड़ी को संगम में स्नान कराने के पश्चात् शिवालय में पूजा अर्चना की गयी तथा भगवान शिव का अभिषेक किया गया। जूना अखाड़े के अन्र्तराष्ट्रीय सभापति श्रीमहंत प्रेमगिरि ने बताया लगभग 800 वर्ष पूर्व आद्यजगद् गुरू शंकराचार्य ने इसी पर स्थान पर नागा सन्यासियों के सबसे बड़े अखाडे जूना अखाड़े की स्थापना की थी। उन्होने बताया कर्णप्रयाग का नाम महाभारत के दानवीर कर्ण के नाम पर पड़ा है। यहा पर दानवीर कर्ण का पौराणिक काल का भव्य मन्दिर है। एक पौराणिक गाथा के अनुसार जहंा वर्तमान में कर्ण मन्दिर है,वह स्थान कभी जल के अन्दर था और मात्र कर्णशिला नामक शिला की एक नोक जल से बाहर थी। कुरूक्षेत्र के युद्व के बाद भगवान कृष्ण ने कर्ण का दाह-संस्कार कर्णशिला की नोक पर अपनी हथेली रखकर उस पर किया था। इसी स्ािन पर कर्ण का मन्दिर स्थित है। श्रीमहंत प्रेम गिरि महाराज ने बताया वृहस्पतिवार को पवित्र छड़ी कुमायूॅ मण्डल के भ्रमण पर साधुओं की जमात जिसकी अगुवाई छड़ी महंत श्रीमहंत विशम्भर भारती,श्रीमहंत शिवदत्त गिरि,श्रीमहंत पुष्करराज गिरि,श्रीमहंत अजयपुरी,कोरोबारी महंत महादेवांनंद गिरि पुजारी महंत परमानंद गिरि कर रहे है,रवाना होगी। पवित्र छड़ी थराली डंगोली होते हुए पौराणिक तीर्थ बैजनाथ धाम दर्शन करने के पश्चात कौसानी में रात्रि विश्राम करेगी।