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शिक्षा जीवन-निर्माण की कला है-देवी प्रसाद त्रिपाठी
September 5, 2020 • Sharwan kumar jha • social

हरिद्वार । शिक्षक दिवस के अवसर पर अखिल भारतीय ब्राह्मण एकता परिषद् द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियो से एक अलग पहचान बनाने वाले शिक्षकों को सम्मानित किया गया। कोरोना महामारी के कारण भारत सरकार द्वारा जारी गाइड लाइन का पालन करते हुए कोई बड़ा आयोजन न कर परिषद के प्रदेश अध्यक्ष पं. मनोज गौतम एवं प्रदेश संयोजक पं. बालकृष्ण शास्त्री ने शिक्षकों के कार्य स्थल एवं उनके निवास पर जाकर अंगवस्त्र एवं पारितोषिक देकर सम्मानित किया। सम्मानित किये जाने वाले शिक्षकों में प्रो.देवी प्रसाद त्रिपाठी कुलपति उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय, डा.प्रेम चन्द शास्त्री गुरूकुल आयुर्वेद विद्यालय एवं उपाध्यक्ष उत्तराखण्ड संस्कृत अकादमी, डॉ.निरंजन मिश्र प्राचार्य भगवानदास संस्कृत महाविद्यालय, डॉ.अरविन्द नारायण मिश्र उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय एवं डॉ.रजनीकान्त शुक्ल पूर्व प्राचार्य बालभारती बीएचईएल प्रमुख थे। इस मौके पर माननीय कुलपति देवी प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि शिक्षा जीवन-निर्माण की कला है। इसका वास्तविक स्वरूप यही है। यद्यपि इस स्वरूप में भौतिकी, रसायन चिकित्सा, वास्तुकला आदि की विविध् जानकारियाँ भी समाविष्ट हैं, पर इनका उद्देश्य जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं का समाधान कर जीवन का निर्माण करना ही है। वर्तमान समय में छात्र और अध्यापक, दोनों के स्तर में गिरावट होने से शिक्षा का स्वरूप भी धूमिल हो गया है। उन्होंने कहा कि डाॅ.राधकृष्णन, जिन्होंने शिक्षक के रूप में गरिमा और सादगी का परिचय दिया। राष्ट्रपति होने के बाद भी वे अपने को शिक्षक ही समझते रहे और 2500 रुपये प्राध्यापक का वेतन लेकर शेष 7500 रुपयों को राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में देते रहे। इसी त्यागवृत्ति व आदर्श शिक्षक होने के कारण उनका जन्म-दिवस 5 सितम्बर शिक्षक-दिवस के साथ अपरिग्रह, आदर्शवादिता के गुणों को अपनाने, विकसित करने की याद दिलाता है। डॉ.प्रेमचन्द शास्त्री ने कहा कि शिक्षक और शिक्षण के आदर्श भले ही लुप्तप्राय हो गए दिखते हों, परन्तु इनकी झलक-झांकी आज भी कुछ शिक्षा-संस्थानों में देखी जा सकती है। शिक्षा को सार्थक बनाने के लिए आज आवश्यकता है शिक्षण को पुनः आदर्शनिष्ठ और गरिमामय बनाया जाए। प्रदेश अध्यक्ष पं. मनोज गौतम ने कहा कि अध्यापक आज अपने पवित्र अध्यापन को भुला ट्यूशन आदि नाना प्रकार के संसाधन जुटाकर धन कमाने के चक्कर में पडे़ हैं। इसी कारण वे कक्षाओं में पढ़ाना, न तो आवश्यकता समझते हैं, न ही अनिवार्य। उनका उद्देश्य मात्र धन कमाना हो गया है। प्रदेश संयोजक पं. बालकृष्ण शास्त्री ने कहा कि आज हम देख रहे हैं कि स्कूल, काॅलेज शिक्षा के पावन मंदिर न रहकर असामाजिकता के अखाडे़ बन गए हैं। जहाॅ कभी छात्र जेब में पेन लेकर प्रवेश करता था, आज वहीं पेन के साथ चाकू, पिस्तौल भी लाने लगा है। जो छात्र कभी शिक्षकों के चरण स्पर्श करने में अपना गौरव समझते थे, आज वही शिक्षकों का गला पकड़ने में बहादुरी मानते हैं। अनुशासन जैसी चीजें तो मात्र पुस्तकों के पन्नों में छिपकर अपनी जान बचाने की सोचने लगी हैं।